लोलारक दुबे सेजौनपुर , अप्रैल 18 -- भगवान परशुराम का जन्म भले ही उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के जलालाबाद में माना जाता हो, मगर उनकी तपोभूमि और कर्मस्थली जौनपुर जिले की सदर तहसील क्षेत्र स्थित आदि गंगा गोमती के पावन तट पर बसे जमैथा गांव को माना जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहीं महर्षि जमदग्नि ऋषि का आश्रम स्थित था और इन्हीं के नाम पर इस क्षेत्र को कभी यमदग्निपुरम् कहा जाता था, जो कालांतर में जौनपुर कहलाया। अक्षय तृतीया के दिन भगवान परशुराम का अवतार हुआ था। इस वर्ष 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के अवसर पर देशभर में परशुराम जयंती श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। उनके गुरु भगवान शिव थे, जिनसे उन्हें परशु (फरसा) प्राप्त हुआ था। पौराणिक परंपरा के अनुसार महाराज गाधि की पुत्री सत्यवती का विवाह ऋचीक ऋषि से हुआ था। उनके पुत्र महर्षि जमदग्नि हुए। जमदग्नि ऋषि का विवाह माता रेणुका से हुआ और इन्हीं के पुत्र भगवान परशुराम थे। स्थानीय कथाओं के अनुसार महर्षि जमदग्नि जब जमैथा स्थित आश्रम में तपस्या कर रहे थे, तब आसुरी प्रवृत्ति के राजा कीर्तिवीर उन्हें परेशान करता था। इसके बाद वे तमसा नदी तट पर भृगु ऋषि के पास गए। वहां से उन्हें अयोध्या जाकर राम और लक्ष्मण से सहायता लेने की सलाह मिली। मान्यता है कि राम और लक्ष्मण ने कीर्तिवीर का वध किया और गोमती में स्नान किया, तभी से वहां के घाट का नाम रामघाट पड़ा।
एक अन्य प्रसंग में कहा जाता है कि पिता की आज्ञा पर परशुराम ने माता रेणुका का सिर धड़ से अलग कर दिया था। बाद में वरदान स्वरूप उन्होंने माता को पुनर्जीवित कराने का निवेदन किया, जिसे महर्षि जमदग्नि ने तपबल से पूर्ण किया। इसी प्रसंग के कारण भगवान परशुराम को मातृ एवं पितृ ऋण से मुक्त माना जाता है।
मान्यता यह भी है कि भगवान परशुराम ने अत्याचारी और आसुरी प्रवृत्ति वाले क्षत्रियों का संहार किया था, न कि संपूर्ण क्षत्रिय समाज का। उनके व्यक्तित्व में शस्त्र और शास्त्र दोनों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। जमैथा गांव में आज भी माता रेणुका का प्राचीन मंदिर स्थित है, जिसे अब अखड़ो देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं।
गांव के निवासी एवं वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. विनोद प्रसाद सिंह (बी.पी. सिंह) ने बताया कि भगवान परशुराम की तपस्थली और माता रेणुका का मंदिर आज आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। उन्होंने कहा कि कुछ वर्ष पूर्व प्रदेश सरकार की ओर से यहां सौंदर्यीकरण कार्य कराया गया था। शेष कार्यों को पूरा कर इस स्थल को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित कराने का प्रयास किया जाएगा, ताकि लोग यहां आकर इस ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर को जान सकें।
इस बीच जौनपुर में भगवान परशुराम की बहुप्रतीक्षित भव्य प्रतिमा भी स्थापित कर दी गई है। यह प्रतिमा राष्ट्रीय राजमार्ग-731 बाईपास पर ग्राम कुल्हनामऊ, तहसील सदर में लगाई गई है। जयपुर से लाई गई प्रतिमा को कुशल इंजीनियरों और वास्तुकारों की देखरेख में स्थापित किया गया।
पंडित मुरलीधर चैरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी एवं उद्योगपति प्रमोद पाठक ने बताया कि प्रतिमा स्थापना के प्रेरक बदलापुर विधायक रमेश चंद्र मिश्र रहे। उन्होंने आधार स्तंभ का पूजन कर प्रतिमा स्थापना की प्रक्रिया संपन्न कराई। उन्होंने बताया कि 19 अप्रैल को परशुराम जन्मोत्सव के अवसर पर 51 बटुक ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजन-अर्चन के बाद प्रतिमा का भव्य लोकार्पण किया जाएगा और इसे आमजन के दर्शनार्थ खोल दिया जाएगा।
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