सहरसा, जनवरी 13 -- सहरसा, रंजीत। फॉग सेफ्टी डिवाइस, इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल सहित अन्य नई तकनीक के आने से पटाखा सिग्नल का उपयोग पहले से कुछ कम जरूर हुआ है। लेकिन, 185 साल पुरातन तकनीक पटाखा सिग्नल की उपयोगिता आज भी बरकरार है। सर्द मौसम में कोहरे के कारण ट्रेन परिचालन में आ रही समस्या से निपटने के लिए अभी भी पटाखा सिग्नल का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा कहीं रेल पटरी टूटने, चटखने या अन्य कारणों से दुर्घटनाग्रस्त होने के खतरा का पता चलता तो लाल कपड़ा दिखाने के अलावा घटनास्थल से 600 व 1200 मीटर की दूरी पर पटरियों पर इसे रखा जाता है। ट्रेन के गुजरते इंजन के चक्के के दवाब पर पटाखा फूटते चालक को अहसास हो जाता कि कोई घटना हुई या होने की आशंका है, फिर वह तुरंत ब्रेक लगाते ट्रेन को रोक देता है। अगर कहीं ट्रेन दुर्घनाग्रस्त होती तो उस लाइन में दोनों तरफ...
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