सीवान, जनवरी 21 -- जिले में पहली बार 1500 एकड़ भूमि में की गई प्राकृतिक खेती ने खेती-किसानी में नया रंग भर दिया है। गेहूं के साथ-साथ सरसों, मसूर व गोभी जैसी फसलों की खेती देसी पद्धति से हुई है। किसानों के अनुसार, प्राकृतिक खेती में सिंचाई का महत्व अधिक है। समय-समय पर हल्की सिंचाई नहीं मिलने पर फसल की बढ़वार रुक जाती थी, जो कि अब नहीं होगी। खेती का स्वरूप बदलने से रासायनिक खाद व कीटनाशक की जगह गोबर, गोमूत्र से बने जीवामृत, घनजीवामृत व देसी घोलों का प्रयोग किया जा रहा है। इसका असर भी साफ दिख रहा है। फसलें हरी-भरी व कीट-व्याधि के प्रकोप से दूर हैं। प्राकृतिक खेती कर रहे किसानों ने बताया कि रासायनिक खेती से साल दर साल मिट्टी की ताकत कम हो रही थी। उपर से अधिक यूरिया व डीएपी के प्रयोग से फसलें कमजोर दिखती थीं। मगर प्राकृतिक खेती में देसी खाद का...
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