पटना, जनवरी 30 -- भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने सवाल किया कि क्या इससे बड़ा कोई प्रमाण हो सकता है कि जाति आज भी हमारे सामाजिक ढांचे पर हावी है और उसी को नियंत्रित व संचालित करती है? शुक्रवार को जारी बयान में उन्होंने आरोप लगाया कि रोहित वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी भेदभाव आज भी लोगों की जान ले रहा है। लेकिन किसी भी अदालत ने इन संस्थागत हत्याओं को न तो प्रतिगामी माना और न ही इन्हें गंभीर और चिंताजनक समस्या के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद, जब अंततः यूजीसी ने चाहे वे कितने ही अपर्याप्त और कमजोर क्यों न हों कैंपसों में जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए कुछ समानता संबंधी नियम जारी किए, तो सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 'जातिविहीन समाज' की दिशा में एक प्रतिगामी बाधा करार दे दिया।
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