बगहा, जनवरी 26 -- बगहा,हसं। आज की युवा पीढ़ी जब आजादी की बात करती है तो उसकी जुबान पर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह जैसे गिने-चुने राष्ट्रीय नाम ही आते हैं। किताबों, भाषणों और मंचों पर यहीं नाम दोहराये जाते हैं। लेकिन आजादी सिर्फ बड़े नेताओं की कहानी नहीं थी। यह कहानी गांवों की गलियों में लिखी गई, खेतों में पली बढ़ी और जेल की कोठरियों में तपकर निकली। बगहा के गांव और यहां की गलियां भी उनमें से एक है, जहां एक-दो नहीं, बल्कि गांव-गांव स्वतंत्रता सेनानी हुये। शहर से लेकर गांव तक कहीं भी स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमा, स्मृति चिन्ह या नामपट तक नजर नहीं आते। यह हाल तब है, जब बगहा कभी आजादी की लड़ाई की रणनीतियां तय करने का अहम केंद्र रहा है। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि बाबा लक्ष्मण दास, हरिराज पाठक, कमलनाथ तिवारी, भो...
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