चतरा, अप्रैल 28 -- सरफराज चतरा। वर्ष 2005 का समय था जब पूरा चतरा जिला माओवादियों के रहमोकरम पर था। बिना नक्सलियों के इजाजत का एक इंट भी विकास का नहीं जुड़ता था। नक्सली ही इसका फैसला करते थे, कि गांव में क्या होना है। ग्रामीण क्षेत्रों में नक्सलियों का इतना भय था कि पुलिस कदम रखने से हिचकती थी। हर ओर माओवादियों का तांडव था। चतरा की धर्ती रक्तरंजित हो रही थी। हर दिन हत्या और नक्सली घटना आम हो गयी थी। राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक माओवादियों से त्रस्त था। ऐसे में जून 2008 में केंद्र ने चतरा जिला की धर्ती पर सीआरपीएफ 190 बटालियन को उतारा। सीआरपीएफ को चतरा में सिफ इसलिये लाया गया ताकि ये नक्सलियों का यहां से खातमा कर सके। 2008 से लेकर 2024 तक सीआरपीएफ के अलग-अलग कंपनियों ने सीधे रूप से माओवादियों से टक्कर लेना शुरू कर दिया। जिससे धीरे-धीर...
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