छपरा, जनवरी 8 -- छपरा, नगर प्रतिनिधि। सारण की पहचान कभी उसकी नदियों से होती थी। गंगा, गंडक और घाघरा जैसी विशाल नदियों के साथ-साथ सरयू, दाहा, कटेया, जोंक, माही , सुखमयी, तैल और दर्जनों छोटी-बड़ी स्थानीय नदियां- धाराएं ,खनुआ नाला, आहर-पईन और मौसमी नाले इस जिले की सामाजिक और आर्थिक रीढ़ थे। इन्हीं जलधाराओं के किनारे गांव बसे, खेतों को पानी मिला और पीढ़ियों से लोगों की आजीविका चलती रही। मछुआरों की नावें पानी चीरती थीं, धोबी नदी घाटों पर कपड़े धोते थे, नाविक लोगों को एक किनारे से दूसरे किनारे पहुंचाते थे और स्थानीय बाजारों में ताजी मछलियों की खुशबू फैलती थी लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह तस्वीर तेजी से धुंधली होती चली गई। जलवायु परिवर्तन, लगातार घटती वर्षा, नदियों पर अतिक्रमण, अवैज्ञानिक तटबंध निर्माण, अनियंत्रित बालू खनन और पारंपरिक जल संरचनाओं...