चाईबासा, फरवरी 24 -- गुवा। सारंडा के घने जंगल एक बार फिर आदिवासी असंतोष और प्रतिरोध के गवाह बने। 23 फरवरी को रांजाबुरु खदान को बंद कर शुरू हुआ आंदोलन 24 फरवरी को दूसरे दिन और उग्र रूप में सामने आया। यह अब केवल धरना नहीं, बल्कि हक और अस्तित्व की खुली लड़ाई बन चुका है। आंदोलनकारियों का साफ कहना है हम भूखे रह लेंगे, लेकिन अपना अधिकार नहीं छोड़ेंगे। बीती रात आंदोलनकारियों के लिए कठिन परीक्षा साबित हुई। खुले आसमान के नीचे सैकड़ों ग्रामीण जिनमें मानकी, मुंडा, मुखिया, महिलाएं, बुजुर्ग और युवा शामिल थे। जंगल के बीच डटे रहे। अचानक हुई बारिश, कड़ाके की ठंड और जंगली जानवरों की आवाजों के बीच पूरी रात प्रतिरोध जारी रहा। कुछ लोगों ने आग जलाकर ठंड से बचने की कोशिश की, तो कई लोग पूरी रात जागते रहे ताकि किसी अनहोनी से साथियों की रक्षा कर सकें। सुबह होते ह...