पीलीभीत, दिसम्बर 31 -- पीलीभीत। बैंकट हॉल में चल रही सात दिवसीय अमृतमयी श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन भक्तों को वृंदावन से आये कथा व्यास गौरवानंद महाराज ने अपनी अमृतमयी वाणी से सती चरित्र और ध्रुव चरित्र का जीवंत वर्णन किया। कथा व्यास गौरवानंद महाराज ने सती चरित्र की व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और अटूट विश्वास ही भक्ति की पहली सीढ़ी है। उन्होंने बताया कि जब सती ने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने आराध्य शिव का अपमान देखा, तो उन्होंने योगशक्ति से अपनी देह का त्याग कर दिया। महाराज जी ने समझाया कि जहाँ भक्त और भगवान का अपमान हो, वहाँ क्षण भर भी नहीं रुकना चाहिए। सती का चरित्र हमें सिखाता है कि बिना मर्यादा और सम्मान के किया गया कोई भी धार्मिक अनुष्ठान फलदायी नहीं होता। कहा कि ध्रुव की तपस्या: असंभव को संभव बनाने की प्रेरणा ह...