रामचंद्र डोगरे, फरवरी 3 -- सत्य ही सर्वस्व है। सत्य के बिना सदाचार, दान, कीर्ति, धन किसी काम के नहीं। जहां सत्य होगा, वहां ये सभी होंगे। सत्य परमात्मा है। सत्य प्रभु से भिन्न नहीं है। सत्य के द्वारा मनुष्य ईश्वर के निकट जा सकता है। जंगलों, पहाड़ों और वीराने में एकांतवास करना तपस्या नहीं है। जीवन में सच बोलना और सच की राह पर चलना ही सबसे बड़ी तपस्या है। धर्म के चार पद हैं- सत्य, तप, दया और पवित्रता। इन चार चरणों में सत्य सर्वोपरि है। महाभारत में राजा सत्यदेव की कथा आती है। एक दिन राजा ने स्वप्न देखा कि चंचला लक्ष्मी उनके महल से कुछ समय पश्चात चली जाएगी। एक दिन सुबह जब सत्यदेव उठे, तो उन्होंने एक सुंदर स्त्री को घर से निकलते देखा। राजा ने आश्चर्य से उस स्त्री से पूछा, 'आप कौन हैं?' जवाब मिला, 'मेरा नाम लक्ष्मी है। अब मैं इस घर से जा रही हूं...