सहारनपुर, सितम्बर 30 -- सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ, बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ, मम हित लागि तजेहु पितु माता, सहेहु बिपिन हिम आतप बात, सो अनुराग कहां अब भाई, उठहुं न सुनि मम बच बिकलाई अर्थात लक्ष्मण के मूर्छित होने पर प्रभु श्रीराम विलाप करते हुए कहते हैं कि हे लक्ष्मण, तुम मुझे किसी तरह दुखी नहीं देख सकते थे। हे भाई, तुम्हारा स्वभाव सदा ही कोमल और मृदुल रहा। मेरे हित के लिए तुमने पिता-माता का त्याग कर दिया, जबकि वनवास मुझे मिला था, तुम्हें नहीं और वन में ठंड, धूप और आंधी-तूफ़ान सहन किया। हे भाई, तुम्हारा वह प्रेम अब कहां है, तुम मेरे व्याकुल वचनों को सुनकर उठते क्यों नहीं हो। इसी तरह रामलीलाओं में मेघनाथ और श्री लक्ष्मण के बीच भीषण संग्राम की लीला दिखाई गई। मेघनाथ की शक्ति से श्री लक्ष्मण के मूर्छित होने पर प्रभु श्रीराम का विलाप देखकर दर्शक ...
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