वाराणसी, फरवरी 23 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। वासंती वातावरण संत को भी असंत कर देता है। पक्षियों का कलरव, फूलों का खिलना, मदमाती बयार आमोद-प्रमोद से आसक्त कर देती है। ये बातें प्रख्यात रंगसमीक्षक प्रो.सत्यदेव त्रिपाठी ने कहीं। वह सोमवार को रंग संस्था कामायनी के मासिक कार्यक्रम 'बतरस' में मुख्य अतिथि थे। महमूरगंज स्थित संस्था कार्यालय में हुए आयोजन में उन्होंने कहा कि संत को भी यह सब नैसर्गिक काम-लावण्य की ओर आकर्षित करता है। कार्यक्रम में वसंत के विभिन्न आयामों पर चर्चा-परिचर्चा एवं आलेख के माध्यम से जहां ज्ञानवर्धक जानकारी साझा की गई। वहीं कविता, गीत, संगीत, अभिनय की मनोहारी प्रस्तुतियों ने वासंतिक वातावरण उत्पन्न किया। संस्था अध्यक्ष डॉ.दीपक कुमार ने कामायनी और बतरस के परिप्रेक्ष्य में वसंत को प्रतिस्थापित किया। आशुतोष शास्त्री ने मधुम...
Click here to read full article from source
To read the full article or to get the complete feed from this publication, please
Contact Us.