वाराणसी, नवम्बर 28 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। काशी में दक्षिण भारतीयों का आना और यहीं का होकर रह जाना नई बात नहीं है। यह परंपरा आदि शंकराचार्य के काशी से प्रस्थान के बाद और भी फली-फूली। उनके बाद कई सौ वर्षों का इतिहास मुगलों और अंग्रेजों ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इसके बावजूद दो सौ साल का इतिहास अब भी सुरक्षित है। काशी के रामघाट मोहल्ले में एक ऐसा ही दक्षिण भारतीय परिवार है जिसने काशी में वेद वेदांत की परंपरा को संजीवनी दी। वैदिक संस्कृति के संरक्षित वर्तमान स्वरूप अब से दो सौ साल पहले द्रविड़ वंश के पुरोधा राम सुब्रमण्य घनपाठी और उनके वंशजों की देन है। राम सुब्रमण्य घनपाठी दो सौ वर्ष पूर्व पिता वेंटकर शेषाद्रि के आदेश पर पदयात्रा कर काशी आए थे। उनकी वंश परंपरा में चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि, काशी में वेद-वेदांत के आधिकारिक विद्वान पद्मश्री प...
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