नई दिल्ली, फरवरी 25 -- मैं जगदंबा से इस प्रकार प्रार्थना किया करता था- 'हे मां आनंदमयी, मुझे दर्शन दे!' कभी-कभी मैं इस प्रकार प्रार्थना करता- 'हे दीनानाथ! हे दीनबंधो, मैं तुम्हारे जगत के बाहर नहीं हूं, प्रभो! मुझमें न ज्ञान है, न भक्ति, न साधन-भजन। मैं कुछ भी नहीं जानता। हे प्रभो, अपनी अहेतुक करुणा से तुम मुझे दर्शन दो।' 'हे मां! मैं लोकमान्यता नहीं चाहता, देहसुख नहीं चाहता। मेरा मन गंगा-यमुना के प्रवाह की तरह तुझमें प्रविष्ट हो। मां, मैं भक्तिहीन हूं, मैं योग-साधना नहीं जानता, मैं दीनहीन हूं, मैं किसी की प्रशंसा नहीं चाहता; कृपा करके मेरे मन को सदा अपने चरण कमलों में निमग्न रख।' 'हे मां! मैं यंत्र हूं, तू यंत्री; मैं गृह हूं, तू गृहिणी; मैं म्यान हूं, तू तलवार; मैं रथ हूं, तू रथी। तू जैसा करवाती है, वैसा ही करता हूं; जैसा कहलाती है, वैसा...
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