कानपुर, फरवरी 7 -- कानपुर, प्रमुख संवाददाता उन्नीसवीं सदी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरूप पूंजी आधारित हो गया, जिसके परिणामस्वरूप पूंजीवाद और मार्क्सवाद जैसी विचारधाराएं उभरीं, लेकिन इक्कीसवीं सदी में यह स्पष्ट हो चुका है कि प्राकृतिक और पूंजीगत संसाधनों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण संसाधन मानव संसाधन है। यह विचार सीए. डॉ. डीआर. अग्रवाल ने मर्चेंट चैम्बर ऑफ़ उत्तर प्रदेश, कानपुर इनकम टैक्स बार एसोसिएशन एवं कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स एसोसिएशन की ओर से आयोजित बजट एवं आर्थिक विमर्श कार्यक्रम में रखे। उन्होंने कहा कि औद्योगीकरण के बाद प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से वैश्विक तापवृद्धि जैसी समस्याएं सामने आईं। विश्व की लगभग 18 से 19 प्रतिशत जनसंख्या होने के बावजूद भारत की वैश्विक आय में हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से भी कम है, जबकि चीन और अमेरि...
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