संभल, मई 22 -- एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने बुजुर्गों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। परिवार में बुजुर्गों को बोझ समझा जा रहा है। पढी लिखी औलाद तक अपने बुजुर्ग माता पिता को वृद्धा आश्रम में छोड़ रही हैं। एक समय था जब बुजुर्ग परिवार की रीढ़ माने जाते थे, लेकिन अब पढ़ी-लिखी औलाद तक उन्हें बोझ समझने लगी है। इसका सबसे कड़वा उदाहरण संभल के चंदौसी में देखने को मिलता है, जहां एक एनजीओ द्वारा संचालित वृद्धाश्रम में कई बुजुर्ग अपने बच्चों द्वारा त्यागे जाने के बाद शरण लिए हुए हैं। इन वृद्धों की पीड़ा सिर्फ अपनों द्वारा छोड़े जाने की ही नहीं है, बल्कि सरकारी तंत्र की उदासीनता भी उनके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा काम कर रही है। हिन्दुस्तान बोले संभल अभियान के अंतर्गत जब संवाददाता ने वृद्धाश्रम का दौरा किया, तो वहां रहने वाले कई ब...
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