दरभंगा, सितम्बर 14 -- दरभंगा। वर्तमान युग में हिंदी की दशा भले ही उतनी अच्छी ना दिखती हो, लेकिन इसकी दिशा बहुत ही सशक्त है। आज जहां हिंदी का अपना वैश्विक बाजार है, वहीं विश्व स्तर पर हिंदी की सृजनशीलता का बोलबाला है। लनामिवि के पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष सह पीजी हिंदी विभाग के सेवानिवृत्त अध्यक्ष प्रो. प्रभाकर पाठक ने शनिवार को हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर सीएम साइंस कॉलेज में आयोजित एकल व्याख्यान में ये बातें कही। हिंदी : घर और बाहर विषय पर आयोजित व्याख्यान में उन्होंने कहा कि हिंदी अगर किसी से हारी है तो वह अपनों से हारी है। वह अपने घर में हारी है। वरना, हिंदी साहित्य का क्षितिज इतना विशाल है कि इसे हराना उतना आसान नहीं है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार 1857 के बाद भारतेंदु ने सर्वप्रथम खड़ी बोली के रूप में हिंदी का सूत्रपात किया। उन्हों...
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