नई दिल्ली, दिसम्बर 15 -- क्या विश्वास (आस्था) की स्वीकृति से हम स्वयं को समझ पाते हैं? होता ठीक इसके विपरीत है। विश्वास चाहे धार्मिक हो या राजनीतिक, स्वयं को समझने में बाधक बनता है। वह एक ऐसे आवरण का कार्य करता है, जिससे हम खुद को देखते हैं। तो क्या हम बिना विश्वास के अपने को देख सकते हैं? दरअसल, जब ऐसा कोई विश्वास न हो, जिसके साथ हमारे मन ने तादात्म्य कर रखा हो, तब इस तादात्म्य से मुक्त होकर मन खुद का, जैसा वह है, अवलोकन कर सकता है और तभी अपने-आप को समझने की शुरुआत होती है। हमारे कितने सारे विश्वास हैं? जितना ज्यादा व्यक्ति बुद्धिवादी होता है, जितना ही अधिक सुसंस्कृत होता है और जितना अधिक 'आध्यात्मिक' होता है, यदि आप मुझे इस शब्द का प्रयोग करने दें, उतनी ही कम उसमें समझने की क्षमता होती है। जो अधिक विचारशील, सजग और सतर्क हैं, वे संभवतः क...