अररिया, फरवरी 12 -- रानीगंज। एक संवाददाता एक डेढ़ दशक पहले तक महाशिवरात्रि नजदीक आते ही होली के गीत अवध में होली खेले रघुवीरा, राम के हाथ ढोलक भल सोहे लक्ष्मण हाथे मंजीरा, अवध में होली खेले रघुवीरा, जोगीरा सा रा रा, रा, रा... के स्वर से गांव की गलियों में सुनाई देती थी। होली का त्योहार नजदीक आते ही कभी ढोलक की थाप व मंजीरों ( पीतल या कांसे की वाद्ययंत्र) के चारों ओर फाग गीत गुंजायमान होने लगते थे, लेकिन आज के इस आधुनिकता के दौर में शहरी क्षेत्रों की कौन कहे अब तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी यह होली के लोकगीतों की पुरानी परंपरा लुप्त होने लगी है। एक दशक पूर्व तक माघ महीने से ही गांव में फगुवा की फागुनी आहट दिखने लगती थी, लेकिन आज के जमाने में फागुन माह में भी गांव फागुनी महफिलों से अछूते नजर आ रहे हैं। आज जहां पुष्प मंजरी, बसंत की अंगड़ाई, पछुआ...
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