गंगापार, मार्च 9 -- पारस्परिक मेल-मिलाप, उमंग और सांस्कृतिक परंपराओं का पर्व होली आधुनिकता के रंग में रंगती जा रही है। समय के साथ होली का स्वरूप बदल रहा है। गांव की चौपालों में गूंजने वाले होली और कबीर की जगह डीजे, हुड़दंग और नशाखोरी ने ले ली है। फाल्गुन मास के शुरू होते ही गांव की चौपालों में होली खेलें रघुबीरा अवध में, काहे की बनी पिचकारी, काहे का गुलाल, फागुन में बुढ़ऊ देवर लगे आदि गीत सुनाई पड़ने लगते थे किन्तु विलुप्त हो रहे हैं। फगुआरों का अता पता नहीं है केवल मोबाइल पर ही बधाई का आदान-प्रदान होता है। कम हो रही होलिका दहन की होड़ गांवों और शहरों में पहले होलिका दहन की तैयारी एक पखवाड़े से शुरू हो जाती थी। बच्चे लकड़ियां और उपले इकट्ठा करते थे। लेकिन बदलती जीवनशैली के कारण होलिका दहन में पहले जैसी होड़ नहीं है। गांव के चिल्ला गौहानी ...
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