नई दिल्ली, जनवरी 1 -- लोगों को विपक्षी दलों पर किंचित भी भरोसा नहीं। किसी मनोवैज्ञानिक से दरयाफ्त करें, कहीं यह खुद पर अविश्वास का सूचक तो नहीं! अमूमन लोग दूसरों के बारे में वैसी ही धारणा बनाते हैं, जैसे खुद होते हैं। मनुष्य की अपनी मानसिक सीमा होती है। मामला यहीं तक सीमित होता, तब भी कोई बात थी। बात आगे बढ़ गई है। थोड़ा सच और ढेर सारा झूठ मिलाकर ऐसे गैर-जिम्मेदाराना आरोप गढ़ लेना, जिनकी कल्पना भी सामान्य आदमी के जेहन में कठिन है। हो सकता है, ऐसा करते समय वे अपनी ही (आपराधिक) मानसिकता का परिचय दे रहे हों। उनकी कल्पना में वही आता हो, जो ऐसी स्थिति में वे खुद करते। सब्र और जिम्मेदारीपूर्ण आलोचना तो भारतीय जनतंत्र की शब्दावली से हटा ही देनी चाहिए। फेसबुक पर भी ऐसे ही गैर-जिम्मेदार और सच-झूठ की मिलावट से नि:सृत कुत्सित आरोपों से भरी पोस्ट बहुताय...