नई दिल्ली, फरवरी 19 -- नई दिल्ली। प्रमुख संवाददाता यदि हम 2047 तक विकसित भारत का स्वप्न साकार करना चाहते हैं, तो हमें विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। उक्त बातें रिचा त्रिपाठी ने हंसराज महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में विकसित भारत @2047 : भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में पर्यावरण संतुलन और सतत विकास विषयक विशेष व्याख्यान एवं संवाद सत्र के दौरान कही। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली हमें सिखाती है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। 'पृथ्वी माता' की अवधारणा हमें उपभोग नहीं, संरक्षण का संदेश देती है। आज की युवा पीढ़ी को 'सस्टेनेबिलिटी' को केवल कॉर्पोरेट शब्द न मानकर जीवन-मूल्य के रूप में अपनाना होगा। उद्योग जगत के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि आधुनिक तकनीक और पारंपर...
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