वाराणसी, फरवरी 1 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। आज का युवा दो स्पष्ट वर्गों में बंटा दिखाई देता है। एक, जो पुश्तैनी दायित्वों को निभाने में संलग्न है। दूसरा जो सपनों की गठरी कंधे पर उठाए विश्वविद्यालयों की देहरी लांघता है। किंतु प्रवेश के साथ ही उसके सम्मुख चुनौतियां, असंतोष, आक्रोश और भविष्य की अनिश्चितता आकार लेने लगती है। यह कहना है साहितयकार डॉ.नीरजा माधव का। वह रविवार को बनारस लिट् फेस्ट के अंतर्गत आयोजित पुस्तक चर्चा में बोल रही थीं। उन्होंने कहा कि उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद रोजगार को लेकर आश्वस्त न हो पाना आज के छात्र की सबसे बड़ी त्रासदी है। यद्यपि यह उपन्यास बीएचयू को केंद्र में रखकर रचा गया है, किंतु वह किसी एक संस्था या एक छात्र की कथा नहीं, बल्कि देश-विदेश के विश्वविद्यालयों में पल रही व्यापक छात्र-चेतना का प्रतीकात...
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