भागलपुर, मार्च 3 -- कजरा।होली पर्व पर विभिन्न गांव के चौक-चौराहों पर होली की ग्रामीण गीत के साथ ढोल की थाप,झाल आदि की आवाज अब सुनाई नहीं देते। इसके बदले अब सिर्फ अश्लील,द्विअर्थी गीत सुनाई पड़ते हैं। पहले राधे घोरना अबीर फेनु न राम जनकपुर में आईए.., खेलहूं रंग बनाइके हो मड़वा में घूमे कन्हैया.., पियवा गेले मिल में देवर घरे हइतेना., हो जोगिरा सड़र, सररर आदि अब गांव के युवा द्वारा नहीं गाया जा रहा है। इस बदलते परिवेश में डीजे की धमक पर द्विअर्थी होली के गीत बज रहे हैं। पहले शाम के वक्त गांव के चौपालों पर दर्जनों ग्रामीण इकत्रित होकर ढोल,मंजिरे के साथ उत्साह पूर्वक होली के गीत गाते थे। भागदौड़ के जिंदगी में अब यह संस्कृति समाप्त होती जा रही है। लोग अब अपने तक ही सिमट कर रह जाते हैं। जिससे हमारे संस्कृति व सभ्यता पर बुरा असर पड़ रहा है।
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