पीलीभीत, अगस्त 14 -- जो पैदल आए और जो ट्रेन से आए। उनकी आंखों का मंजर तो कोई बयां ही नहीं कर सकता है। हम तो पानी वाले जहाज से पहले बंबई आए और फिर रायपुर पहुंचे। वहां जिदंगी के तमाम सबक लेते हुए परिवार के साथ जैसे तैसे पीलीभीत पहुंचे थे। यहां पहले से ही आ गए हमारे रिश्तेदारों ने वो फर्ज निभाया कि जो आज अपने अपनों के लिए नहीं निभाते हैं। विभाजन की विभीषिका को याद करते हुए 82 वर्षीय प्रभुदास दुलवानी ने बताया कि पिता का पाकिस्तान के कंधार में शक्कर गांव के अंतर्गत अच्छा खासा काम था। हवेली थी। पर विभाजन हुआ तो हम दर दर के हो गए। मारकाट लूटपाट और अनाचार ऐसा था कि उन दिनों को याद कर लें तो मन आज भी विचलित हो जाता है। इसके बाद जैसे तैसे पीलीभीत आए तो यहां काशीराम ज्ञानचंद भट्टा वाले हमारे बुआ और फूफा ने हमारा साथ दिया। जो पैसा हमे बसर करने के लिए...
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