बिल्ल्होर, जुलाई 17 -- कानपुर। पूरब का मैंचेस्टर, यूपी की औद्योगिक राजधानी और कामगारों का तीर्थ। कभी कानपुर को ऐसे भी पुकारा जाता था। सुबह-शाम मिलों के भोंपू बजते थे, गलियां-सड़कें कामगारों की भीड़ की गवाह रहती थीं। उसी शहर में तकरीबन रोज किसी न किसी मजदूर की जान व्यवस्थागत खामी से जाती है और अपनों के सिवा कोई आंख नम नहीं होती। दिल नहीं दहलते। मदद और सुधार तो दूर सहानुभूति के भाव तक नहीं जागते। सफाई करते हुए सीवर की जहरीली गैस से, काम करते हुए हाईटेंशन लाइन के करंट से, बिल्डिंग बनाते हुए कई मंजिल ऊपर से गिरकर। बिजली के फॉल्ट ठीक करते हुए लाइन चालू हो जाने से..। मजदूरों को मौत हजार रास्तों से घेर लेती है। खबरें छपती हैं, कुछ मदद हो जाती है। बिलखते परिवारों के गम पर समझौते के कुछ छींटे पड़ जाते हैं। बाद में कौन देखता है कि उसकी बेवा कैसी है? ब...
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