नई दिल्ली, दिसम्बर 6 -- सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार हमारे एक साहित्यिक मित्र बड़े ही पुस्तक-प्रेमी रहे। दिल्ली में जब भी कोई नई अंग्रेजी पुस्तक आती, वह उनके पास होती। वह अक्सर कुछ नई पुस्तकों को अपने कलेजे से इस तरह लगाकर कैंपस में घूमते नजर आते कि उनके नाम सामने वालों को दिखते रहें। 'भैयाजी' की इस मुद्रा को देख हमारे जैसे काहिलों को बड़ी जलन होती। उनके आगे हम अपने को हीन समझते। लगता, असली ज्ञानी वही हैं, हम तो एकदम 'बौड़म' हैं। उनके बोलने से विद्वता टपकती। गोष्ठियों में वह किसी को इलियट से आगे का कवि और किसी को मीरा से आगे की कवयित्री घोषित कर देते। हममें से कई उनकी अहो-अहो करने लगते। एक शाम उनके निकट के मित्र ने उनके पुस्तक-प्रेम की असलियत बताई कि यार, बंदा एकदम 'फ्रॉड' है। दिल्ली में हर सप्ताह दुनिया से दर्जनों अंग्रेजी पुस्तकें 'इंपो...