कानपुर, फरवरी 14 -- शिवली, संवाददाता। भगवान के भक्त व सदाचारी होने के बाद भी जाने-अनजाने में गुरू व मित्र से किए गए छल का दंड मानव को भोगना ही पड़ता है। निष्काम कर्मयोगी व भगवान के परमभक्त होने के बाद भी सुदामा को बाल्यावस्था में अपने मित्र से छिपाकर गुरूमाता के दिए चने खाने के कारण दरिद्रता का दंश मिला। शनिवार को बैरी दरियाव गांव के सांवरा श्याम मंदिर में भगावत कथा सुनाते हुए आचार्य ने यह बात कही। बैरी दरियाव गांव क सांवरा श्याम मंदिर परिसर में चल रही भागवत कथा के अंतिम दिन आचार्य मृदुल जी ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहाकि गृहस्थ जीवन में मनुष्य को तनाव से बचने के लिए संतोषी बनना आवश्यक है। उन्होंने कहाकि सुदमा दीनहीन ब्राह्मण नहीं निष्काम कर्मयोगी थे, लेकिन बाल्यावस्था में गुरूमाता के दिए चने अपने मित्र श्रीकृष्ण से छिपाकर खाने के...
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