सीतापुर, अक्टूबर 8 -- दीपों का पर्व दीपावली करीब आते ही देशभर के बाजारों में रौनक लौट आती है। मिठाइयों, सजावटी सामान और कपड़ों की दुकानों के साथ-साथ इस त्योहार के सबसे अहम प्रतीक मिट्टी के दीये भी लोगों की पहली पसंद बन जाते हैं। लेकिन जहां एक ओर दीपावली आम जन के लिए खुशियों का पर्व है, वहीं कुम्हार समाज के लोगों के लिए यह मेहनत और संघर्ष का मौसम भी है। यही वह समय होता है जब सालभर के इंतजार के बाद कुम्हार परिवार अपने हुनर के जरिए कुछ बेहतर कमाई की उम्मीद करते हैं। दीपावली के अवसर पर सिर्फ दीयों की ही नहीं, बल्कि मिट्टी की बनी लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं, धूपदान, मिट्टी के कलशों और सजावटी बर्तनों की भी काफी मांग रहती है। इस सबके बावजूद मिट्टी को आकार देने वाले कुम्हार समाज के लोगों के सामने समस्याओं का अंबार है। माटी कला से बड़ी परेशानी है कि...
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