सीतापुर, फरवरी 13 -- ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले कारीगर, स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) और लघु उद्यमी आज भी अपने उत्पादों के लिए स्थायी और सशक्त बाजार की तलाश में हैं। एक तरह से ग्रामीण कारीगरों और एसएचजी महिलाओं के लिए ये योजना उम्मीद की दुकान है। सरकार की सरस हाट और मनरेगा हाट जैसी योजनाएं इस दिशा में एक मजबूत पहल जरूर हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन योजनाओं का लाभ अभी सीमित दायरे तक ही सिमट कर रह गया है। सीतापुर जिले में सरस हाट की बेहद कम संख्या और अधिकांश साप्ताहिक बाजारों का खुले आसमान के नीचे लगना, ग्रामीण उद्यमियों और महिलाओं की राह में अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। मौजूदा समय में जिले में सिर्फ दो सरस हाट हैं, जबकि मनरेगा हाट की संख्या 41 है। जो जरूरत के लिहाज से बहुत कम है। सरस हाट का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण शिल्पक...