भागलपुर, सितम्बर 13 -- प्रस्तुति : विजय झा मिथिला क्षेत्र की पारंपरिक चित्रकला, जिसे मधुबनी पेंटिंग कहा जाता है, सदियों से सामाजिक एवं धार्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। विवाह, उपनयन, मुंडन, सत्यनारायण पूजा, भातृ द्वितीया जैसे अवसरों पर महिलाएं दीवारों और घरों को रंग-बिरंगी चित्रकलाओं से सजाती हैं। कोहबर, अरिपन, सीता स्वयंवर, देवी-देवताओं के चित्र इस कला की खास पहचान हैं। यह कला प्राकृतिक रंगों से, ब्रश या माचिस की तीली, उंगलियों से बनाई जाती है। आधुनिकता और रेडीमेड कलाकृतियों के बढ़ते उपयोग के कारण यह परंपरा ग्रामीण क्षेत्रों में धीरे-धीरे घट रही है। इसके बावजूद मधुबनी पेंटिंग का व्यावसायिक महत्व लगातार बढ़ रहा है और यह वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय हो रही है। मिथिला चित्रकला भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की उन अमूल्य कलाओं में से है, जिसकी जड़े...
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