भागलपुर, फरवरी 13 -- -प्रस्तुति: विजय झा बनगांव गोशाला का इतिहास केवल एक संस्था का इतिहास नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की उस सोच का प्रतिबिंब है जिसमें गाय को माता, कृषि को आधार और सामूहिक सहयोग को संस्कार माना गया। स्थापना के शुरुआती वर्षों में यह गोशाला न केवल बेसहारा और वृद्ध गायों का सुरक्षित आश्रय थी, बल्कि दुधारू पशुओं के पालन से स्थानीय लोगों को शुद्ध दूध भी उपलब्ध कराती थी। उस समय दर्जनों पशुपालक अपनी बूढ़ी अथवा कम दूध देने वाली गायों को बेचने के बजाय गोशाला को दान देते थे। इससे एक ओर पशु क्रूरता पर रोक लगती थी, वहीं दूसरी ओर गौवंश का संरक्षण भी होता था। समय के साथ परिस्थितियां बदलीं, लेकिन जिम्मेदारों की सोच और व्यवस्था उसी गति से आगे नहीं बढ़ सकी। प्रबंधन समिति की निष्क्रियता का परिणाम यह हुआ कि धीरे- धीरे गायों की संख्या कम होती गई...
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