भागलपुर, दिसम्बर 19 -- - प्रस्तुति : विजय झा ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे औषधीय पौधे अब तेजी से समाप्त हो रहे हैं। एलोपैथिक दवाओं की बढ़ती लोकप्रियता और पारंपरिक ज्ञान की अनदेखी से प्राकृतिक औषधियों का महत्व घटता जा रहा है। कभी गांवों के लोग तुलसी, गिलोय, पुदीना, हरशृंगार, ब्राह्मी जैसी जड़ी-बूटियों से सामान्य रोगों का इलाज स्वयं करते थे, लेकिन अब जानकारी के अभाव और आधुनिकता के मोह में लोग इनसे दूर हो गए हैं। कोरोना काल में जब गिलोय और अन्य औषधीय पौधों ने रोग प्रतिरक्षा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई, तब जागरूकता बढ़ी जरूर, पर टिक नहीं सकी। सरकारी स्तर पर आयुष चिकित्सकों की तैनाती के बावजूद अस्पतालों में आयुर्वेद को अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल पाया है। यदि इन पौधों के संरक्षण और पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली के सशक्तीकरण की दिशा में ठोस कद...
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