मिर्जापुर, जुलाई 9 -- नाम है पल्लेदार। काम है बोझ उठाना। जगह है रेलवे स्टेशन का माल गोदाम। सुबह सूरज के साथ इनके कंधों पर बोरे चढ़ते हैं। शाम ढलने पर बदन में थकान उतरती है, लेकिन, जेब खाली, दिल भारी, जिंदगी फिर भी जारी। देश की आपूर्ति व्यवस्था में इनका योगदान अमूल्य है। बदले में इन्हें मिलती है असुरक्षा और उपेक्षा। ये पल्लेदार व्यवस्था को अपनी पीठ पर ढो रहे हैं, लेकिन इनके दर्द को कोई सुनने वाला नहीं। वे चाहते हैं कि दूसरे श्रमिकों की तरह उन्हें भी हक और सम्मान मिले। रेलवे स्टेशन के माल गोदाम के पल्लेदार जिले की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मगर उन्हें उचित मान-सम्मान और सुविधा नहीं मिलती। गर्मी में पसीना बहाने वाले पल्लेदार कंधे पर देश की सप्लाई चेन ढोते हैं, पर खुद जिंदगी की बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर हैं। न काम की ग...
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