मथुरा, दिसम्बर 15 -- कभी ब्रज भूमि ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत में कबड्डी गांव-गांव की पहचान हुआ करती थी। खेतों की मेड़ों से लेकर गलियों, चौपालों और मैदानों तक कबड्डी के मैच आम नजारा होते थे। यह खेल न केवल युवाओं की ताकत और फुर्ती का प्रतीक था, बल्कि ग्रामीण संस्कृति, अनुशासन, रणनीति और टीम भावना का भी मजबूत आधार था। समय बदला, तकनीक आगे बढ़ी और उसके साथ ही यह पारंपरिक खेल धीरे-धीरे हाशिए पर जाता चला गया। ज के खेलों में आज भी कबड्डी का विशेष स्थान है, लेकिन इसका वह गौरवशाली मुकाम अब नहीं रहा, जो कभी हुआ करता था। बदलते दौर में मोबाइल, टीवी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक ने खेल के मैदानों की जगह ले ली है। युवाओं के साथ बच्चे, बुजुर्ग, महिला एवं युवतियां भी इन उपकरणों के आदी होते जा रहे हैं। नतीजतन गांवों की चौपालें और अखाड़ों में जहां कभी कबड्डी की गू...
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