बिजनौर, जून 18 -- एक समय था जब बच्चे शतरंज से दूर थे। आज स्कूलों में बच्चे शतरंज में हाथ आजमा रहे हैं, लेकिन संसाधनों का अभाव बच्चों को आगे नहीं बढ़ने दे रहा है। जिले से डी गुकेश जैसे शतरंज के खिलाड़ी निकालने के लिए प्रयास शुरू हुए हैं। शतरंज को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन संसाधनों का अभाव आड़े आ रहा है। भले ही आज दो हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में बच्चे शतरंज खेल रहे हैं, लेकिन स्कूलों में कुशल प्रशिक्षक की कमी खल रही है। जिला प्रशासन ने शतरंज को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए हैं। स्कूलों में चेस बोर्ड बंटवाए गए हैं, लेकिन अनुभवी प्रशिक्षक नहीं हैं। इतना ही नहीं अभिभावक भी बच्चों की प्रतिभा को लेकर जागरुक नहीं है। हालात ऐसे है कि प्रतियोगिता कराने के लिए प्रायोजक तक नहीं मिलते हैं। शतरंज ऐसा खेल है कि जिससे खिलाड़ी का मानसिक और बौद्धिक विकास...
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