बाराबंकी, अक्टूबर 8 -- दीपावली का पर्व नज़दीक आते ही बाजारों में मिट्टी के दीयों, कलशों और सजावटी बर्तनों की मांग तेजी से बढ़ जाती है। इस समय कुम्हार समाज के लोगों के लिए कमाई का सबसे बड़ा अवसर होता है। परंपरागत हुनर और मेहनत के बल पर वे हर साल लाखों घरों को रोशनी से सजाते हैं, लेकिन इन कारीगरों को अपने इस काम में कई बड़ी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता हैं। कुम्हारों का कहना है कि रंग, कोयला, लकड़ी और अन्य कच्चे माल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। अच्छी गुणवत्ता की मिट्टी न मिलने से दीयों की टिकाऊपन पर असर पड़ता है। कई बार उन्हें दूरदराज़ से मिट्टी मंगवानी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ जाती है। स्थानीय कारीगरों को अब सस्ते चीनी इलेक्ट्रॉनिक दीयों और प्लास्टिक प्रोडक्ट्स से कड़ी टक्कर मिल रही है। उपभोक्ता आकर्षक दिखने वाले सस्ते विकल्पों की ओर खिंच जाते हैं...
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