बस्ती, मार्च 3 -- Basti News : 'नींद आएगी भला कैसे उसे शाम के बाद, रोटियां भी न मयस्सर हों जिसे काम के बाद। अजहर इकबाल की यह शायरी मजदूरों की सचाई बयां करती है। हर सुबह सपनों की गठरी बांधे मजदूर घर से निकलते हैं। कड़ी मेहनत से खाली जमीन पर आलीशान कोठी खड़ी कर देते हैं। खून-पसीना बहाने वाले मजदूरों के पास हुनर तो है पर स्थायी रोजगार नहीं। दिन भर मेहनत करते हैं। जैसे-तैसे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते हैं। जिस दिन काम नहीं मिलता, उस शाम इन्हें भूख से ज्यादा अपमान सालता है। अनपढ़ होने के कारण सरकारी योजनाओं का ये लाभ भी नहीं उठा पाते हैं। 'हिन्दुस्तान' से बातचीत में दिहाड़ी मजदूरों ने अपना दर्द साझा किया। जिले में कुल दो लाख 24 हजार 901 पंजीकृत मजदूर हैं। जिले में विभिन्न चौराहे पर हजारों की संख्या में मजदूरों की मंडी लगती है। मजदूरों का कहना है...
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