वाराणसी, मई 22 -- वाराणसी। महिला-पुरुष की जीवनधारा के बीच एक और तबका है जो इसी समाज का हिस्सा है। वह है ट्रांसजेंडर। वह इसी समाज में रचता-बसता है, लेकिन उसे लगता है कि समाज का नजरिया संकुचित, विकृत है। इसलिए पग-पग पर जलालत झेलनी पड़ती है। पुलिस हो या दूसरे सरकारी विभाग, कहीं उनकी समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाता। इसे शेल्टर होम की दरकार है। समाज के सदस्य चाहते हैं कि शहर में ट्रांस शौचालय बनें। शिक्षण संस्थानों के हॉस्टलों में उनके लिए कमरे आरक्षित हों। उनकी पहचान का कार्ड बने। केवल आधी आबादी की बात करते रहना तब तक बेमानी लगता है, जब तक कि ट्रांसजेंडर समाज की समस्याओं को भी अधिकारों से न जोड़ा जाए। ट्रांसजेंडर समाज के उत्थान के लिए निरंतर आवाजें उठें और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के उपक्रम हों तो यह तबका भी स्वस्थ भारत ...
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