भागलपुर, दिसम्बर 10 -- प्रस्तुति : नीरज कुमार/देवाशीष गुप्ता कटिहार की मिट्टी में आज भी सुर गूंजते हैं, ताल धड़कती है और लोककथाएं सांस लेती हैं, मगर उन्हें सुनने-देखने वाले मंचों की रोशनी धीमी पड़ती जा रही है। यहां कलाकार जन्म तो लेते हैं, पर संवरने से पहले ही बिखर जाते हैं-कभी संसाधनों की कमी से तो कभी उपेक्षा की चोट से। जट-जटिन, झिझिया, नौटंकी और शास्त्रीय परंपराओं की थाप अब भी जीवित है, लेकिन परंपरा को आगे बढ़ाने वाले हाथ थक चुके हैं। स्थानीय कलाकारों को न तो समुचित प्रशिक्षण मिल पाता है, न मंच, न ही प्रोत्साहन। सरकारी योजनाएं कागजों में सिमटी हैं और निजी संस्थाएं भी उदासीन हैं। परिणामस्वरूप युवा कलाकार रोजगार और नाम की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। गांवों के आंगनों में गूंजने वाले गीत अब मोबाइल की रिकॉर्डिंग तक सिमट गए हैं। क...