पूर्णिया, फरवरी 18 -- -प्रस्तुति : ओमप्रकाश अम्बुज, मोना कश्यप गंगा-कोसी की गोद में बसा कटिहार आस्था, संस्कृति और इतिहास की परतों से बना एक जीवंत मानचित्र है। लेकिन इन परतों पर समय की धूल जमती जा रही है। सवाल यह है कि क्या हम अपनी ही विरासत को चुपचाप बिखरते देख रहे हैं? सबसे पहले बात त्रिमोहिनी संगम की। धार्मिक महत्व के इस स्थल पर वर्ष 1948 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थि-भस्म का विसर्जन हुआ था। माघी पूर्णिमा पर हजारों श्रद्धालु यहां आस्था की डुबकी लगाते हैं, लेकिन स्थायी संरचनाएं, सूचना पट्ट, शौचालय और व्यवस्थित सौंदर्यीकरण अब भी अधूरे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि योजनाबद्ध विकास हो तो यह सीमांचल का बड़ा धार्मिक पर्यटन केंद्र बन सकता है। मनिहारी घाट की कहानी भी कुछ अलग नहीं। छठ और अन्य पर्वों पर उमड़ती भीड़ के बाद वर्ष भर घाट...
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