भागलपुर, जनवरी 22 -- -प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज कटिहार की सड़कों पर रोजाना एक ऐसा दृश्य दोहराया जा रहा है, जिसे देखकर भी अनदेखा कर दिया जाता है। चौक-चौराहों, गलियों और व्यस्त बाजारों में भटकते बेजुबान। गाय, सांड, कुत्ते, बिल्ली और बंदर। खामोशी से अपने हिस्से का दर्द ढो रहे हैं। उनकी आंखों में सवाल हैं, लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं। भूख, उपेक्षा और असुरक्षा ने उन्हें ऐसा बना दिया है कि वे अब सिर्फ आवारा नहीं, बल्कि सिस्टम की असफलता का प्रतीक बन चुके हैं। शहर में बनाए गए शेल्टर हाउस कागजों में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयान करती है। जिन आश्रय स्थलों का उद्देश्य बेसहारा पशुओं को सुरक्षा और सहारा देना था, वे आज उद्देश्यविहीन नजर आते हैं। न वहां नियमित चारा-पानी की व्यवस्था है, न देखरेख की। कई जगह तो शेल्टर केवल बोर्ड तक सिम...
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