पूर्णिया, अगस्त 21 -- प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज, मुदस्सिर नजर गांव की गलियों से शहर की तंग बस्तियों तक पशुपालन हर घर की जीविका का आधार है। दूध से बच्चों का पोषण होता है, दही-घी से गृहस्थी चलती है और गोबर-मूत्र से खेती को सहारा मिलता है। लेकिन इसी सहारे पर टिकी आजीविका अब संकट से घिरी है। मवेशियों की बीमारी या अचानक मौत से पूरा परिवार टूट जाता है। एक गाय या भैंस खोने का मतलब है रोजी-रोटी का सहारा छिन जाना। बढ़ती महंगाई, पशुचारे की कमी, बीमारियों का प्रकोप और बीमा योजनाओं की जटिलता ने पशुपालकों की परेशानियां और बढ़ा दी हैं। गांव की गलियों से शहर की तंग बस्तियों तक, पशुपालन आज भी हर घर की जीविका का सहारा है। दूध से बच्चों का पेट भरता है, दही-घी से गृहस्थी चलती है और गोबर-मूत्र से खेती को जीवन मिलता है। यही कारण है कि किसान न केवल अपने परिवा...
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