भागलपुर, जनवरी 11 -- -प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज कटिहार जिला ही नहीं, बल्कि पूरा सीमांचल और कोसी अंचल हर साल आग के डर के साए में जीता है। जैसे ही चैत और बैशाख का महीना आता है, तेज हवा, सूखी फसल और घनी आबादी वाले गांवों में एक छोटी सी चिंगारी पूरे टोले को राख में बदल देती है। यह कोई प्राकृतिक आपदा भर नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक उपेक्षा का नतीजा है। अगर पंचायत स्तर तक अग्निशमन यंत्रों और यूनिटों की मुकम्मल व्यवस्था होती, तो शायद हर साल होने वाले करोड़ों-अरबों रुपये के नुकसान को रोका जा सकता था। सीमांचल और कोसी के अधिकांश पंचायत ऐसे हैं, जहां घर एक-दूसरे से सटे हुए हैं। फूस, खपरैल और लकड़ी से बने मकान आग पकड़ते ही पल भर में भभक उठते हैं। शॉर्ट-सर्किट, चूल्हे की चिंगारी या खेत में जलाई गई पराली से उठी आग देखते ही देखते पूरे गांव...
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