उरई, फरवरी 18 -- उरई। 'हम जान छिड़कते हैं जिस फूल की ख़ुशबू पर, वो फूल भी कांटों के बिस्तर पे खिला होगा। जी हां साहब ये हकीकत है, हम कांटों से संघर्ष कर फूलों का कारोबार करते हैं। आप के घर और मंदिर में जो फूलों की खुशबू फैली है उसकी सिंचाई हमने अपने पसीने से की है। इसके बावजूद हमारे जीवन में महक नहीं है। हमारा कोई न ठौर है न ठिकाना, अतिक्रमण के नाम पर हमारी बगिया उजड़ जाए, यह कोई नहीं जानता। हम सालों से एक स्थायी जगह की आस लिए बैठे हैं। स्थायी ठिकाना मिल जाता तो हमारा कारोबार फूलों की तरह खिल उठता। मंदिरों के आसपास दुकानें तो सजा ली हैं पर हमेशा यही डर सताता है कि क्या पता कब अतिक्रमण के नाम पर हमारी फूलों की डलिया सड़क या नाली में फेंक दी जाएं। यह बताते-बताते फूल व्यापारी गुरुदयाल की आंखें भर आईं। सुविधाओं के बारे में उनसे पूछा गया तो बोले,...
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