उन्नाव, अगस्त 29 -- क्या बताएं साहब..सालभर की कमाई एक महीने की बाढ़ में खर्च हो जाती है। पूरी गृहस्थी तहस-नहस हो जाती है। बच्चों की पढ़ाई से लेकर रोजी-रोजगार सब छूट जाता है। सालों से यह दंश झेल रहे हैं। हमारी तो आधी से ज्यादा जिंदगी कट गई लेकिन बच्चे अब यहां नहीं रहता चाहते हैं। आपके अपने अखबार 'हिन्दुस्तान की टीम जब शुक्लागंज में बाढ़ पीड़ितों के बीच पहुंची तो कमोवेश सभी का यह दर्द फूट पड़ा। गंगा के तटवर्ती इलाकों की हालत ऐसे हैं कि घर होते हुए भी लोग बेघर की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। कोई राहत शिविरों में शरण ले रहा है तो कोई सड़क किनारे 'खानाबदोशों की तरह रह रहा है। बाढ़ की मार झेल रहे लोगों का कहना था कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों से गुहार है कि अब इस समस्या का निदान कराया जाना चाहिए। ब से बाढ़ और 'ब से बेबसी एक दूसरे के पर...
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