नई दिल्ली, फरवरी 4 -- जिंदगी में हम अक्सर ऐसे तर्क-वितर्क में उलझ जाते हैं जिनका ना कोई नतीजा निकलता है और ना ही मन को शांति मिलती है। आध्यात्मिक काउंसलर और लेखक नित्यानंद चरण दास कहते हैं कि हर बहस जीतने लायक नहीं होती। हमारा झूठा अहंकार (False Ego) हमें सही साबित होने के लिए लड़ने को उकसाता है, जबकि हमारी आत्मा शांति और ऊर्जा की रक्षा करना चाहती है। सच्ची समझ यह जानने में है कि कब बोलना है और कब चुप रहना ही बुद्धिमानी है। नित्यानंद चरण दास इस बात को एक बेहद सरल लेकिन गहरे उदाहरण से समझाते हैं - गधे और बाघ की कहानी। STORY: एक बार एक गधा और बाघ घास के रंग को लेकर बहस करने लगे।गधा कहता है, 'घास नीली है।'बाघ कहता है, 'घास हरी है।' दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे। बहस बढ़ती गई और वे फैसला कराने शेर के पास जा पहुंचे। शेर ने सोच-समझकर कहा, 'हा...
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