नई दिल्ली, नवम्बर 8 -- वह किशोर इतना कमजोर था कि जरा-सा जोर शरीर पर पड़ते ही बिस्तर खोजने लगता था। उसकी इस कमजोरी से माता-पिता भी बहुत परेशान रहते थे। नाना उपाय किए गए, पर कमजोरी दूर न हुई। इसी कमजोरी का नतीजा था कि मन में हमेशा भय बैठा रहता था। वैसे तो पूरे कोरिया में भय का वास था, जापान ने ताकत से सबको दबा रखा था। एक बार तो ऐसी स्थिति बनी कि उस किशोर को स्कूल से निकाल दिया गया। पढ़ाई थम गई। वहां ऐसे बहुत लड़के थे, जिनकी पढ़ाई छूटी थी। हर तरफ बुरी संगत का साया था। ऐसे माहौल में ही उम्र जवानी की दहलीज पर चढ़ गई थी। कोरिया में गुजारा मुश्किल था, तो पिता ने युवा बेटे को जापान भेजने का फैसला किया, ताकि वहां जाकर बेटा कोई कला ही सीख ले, ताकि अपनी जिंदगी ठीक से बसर कर सके। उन्होंने जापान के क्योटो में अपने बेटे के लिए सुलेख विद्या सीखने का इंत...