बांका, नवम्बर 5 -- बौंसी, निज संवाददाता। विधानसभा चुनाव की चहल-पहल के बीच बांका जिले के बुनकर बहुल गांव डहुआ के लोगों की उम्मीदें एक बार फिर जाग उठी हैं। चुनाव आते ही नेताओं द्वारा बुनकरों की समस्याओं को दूर करने के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही ये वादे अक्सर धूल फांकते नजर आते हैं। डहुआ गांव में तैयार सूती साड़ी, लूंगी, गमछी और विशेष रूप से पंछी वस्त्र की पहचान बिहार ही नहीं, बल्कि उड़ीसा, असम, बंगाल और झारखंड तक है। करीब 15 हजार आबादी वाले गांव की 90 प्रतिशत जनसंख्या आज भी पॉवरलूम व हैंडलूम उद्योग पर निर्भर है। एक समय था जब गांव में दिन-रात पावरलूम की आवाज गूंजती थी। गांव जागता था, घर-परिवार खुशहाल थे। लेकिन महंगाई, धागों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि तथा सरकारी उपेक्षा ने इस उद्योग को गहरी चोट पहुंचाई। कभी डहुआ...
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