जयपुर, अगस्त 17 -- जयपुर की छोटी काशी एक बार फिर भक्ति और उल्लास से सराबोर हो उठी। गोविन्ददेवजी मंदिर में आधी रात का वो क्षण जैसे समूचे ब्रह्मांड को थामे खड़ा था। घड़ी की सुइयां जैसे ही 12 पर पहुँचीं, भक्तों का इंतजार खत्म हुआ और शंखनाद के साथ भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ। मंदिर प्रांगण में घड़ियाल, मंजीरे, मृदंग और ढोलक की ध्वनि गूँज उठी। 'राधे-राधे. गोविंद जय जय.' के जयकारों से पूरा दरबार गुंजायमान हो गया। भगवान के प्राकट्य के उस दिव्य क्षण को देखकर हर भक्त भाव-विह्वल हो उठा। ऐसा लगा मानो द्वापर युग का नंदगाँव जीवंत हो उठा हो। "जन्मे ललना. नंदजी के अंगना, जन्मे हैं कृष्ण कन्हाई." की बधाइयाँ गूँजते ही वातावरण भक्ति और उल्लास से भर गया। मध्यरात्रि के इस पावन क्षण पर मंदिर प्रांगण आस्था का महासागर बन गया। शंखध्वनि के साथ ही 31 हवाई तोपो...
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